ब्लॉग छत्तीसगढ़

14 February, 2018

सीपी एण्‍ड बरार के तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री डॉ. नारायण भास्‍कर खरे का विद्रोह

अंग्रजों के जमाने में सीपी एण्‍ड बरार  में सन् 1924 को हुए चुनाव में स्‍वराज्‍य पार्टी नें बहुमत प्राप्‍त किया था। दल के नेता के रूप में पं.रविशंकर शुक्‍ल का नाम सामने आया था किन्‍तु उस समय उनको दल का नेता नहीं चुना गया और डॉ.मुंजे को दल का नेता चुन लिया गया था। उस समय भौगोलिक क्षेत्रीयता के आधार पर भाषा संबंधी दबदबे की राजनीति भी साथ थी। पार्टी में कुछ आंतरिक कलह पं.शुक्‍ल को नेता नहीं चुने जाने के कारण से ही, आरंभ हो गया था। 2 अगस्‍त 1955 को प्रकाशित शुक्‍ल अभिनंद ग्रंथ में यह जानकारी दी गई है। हालांकि यह ग्रंथ इस बात को यहां स्‍पष्‍ट ना करते हुए अन्‍य दिशा की ओर मोड़ता है क्‍योंकि जाहिर तौर पर यह अभिनंदन ग्रंथ है। आगे कांग्रेस के केन्‍द्रीय पदाधिकारियों के निर्देश से दल नें कार्य आरंभ नहीं किया फलत: गर्वनर नें तदर्थ मंत्रीमंडल बनाया जो अविश्‍वास प्रस्‍ताव में गिर गया था। सन् 1936 में जब धारा सभा (लेजिस्‍लेटिव असेंम्‍बली) का निर्वाचन हुआ तब भी यह अंतर कलह विद्यमान रहा। 14 जुलाई 1937 को सभा के आयोजन में डॉ. नारायण भास्‍कर खरे को दल का नेता चुना गया। डॉ. खरे के नेतृत्‍व में मंत्रीमंडल का गणन किया गया जिसमें पं.रविशंकर शुक्‍ल, पं.द्वारिका प्रसाद मिश्र, रामाराव देशमुख, पुरसोत्‍तम बलवंत गोलवकर, दुर्गाशंकर मेहता, बैरिस्‍टर मो. यूसूफ शरीफ आदि थे। 30 जुलाई 1937 को लेजिस्‍लेटिव असेम्‍बली का पहला अधिवेशन हुआ जिसमें धनश्‍याम सिंह गुप्‍ता स्‍पीकर चुने गए।       
नवनिर्वाचित प्रीमियर डॉ. खरे के मंत्रीमंडल में शुरू से ही मतैक्य नहीं था, ग्रंथ के मुताबिक उसके मंत्रीमंडल में दो दल बन गये थे। मुख्यमंत्री (ग्रंथ में यह लिखा गया है कि यह उस समय प्रधानमंत्री कहलाता था जबकि 'द इंडियन एनुअल रजिस्‍टर 1938' में इसे प्रीमियर संबोधित किया गया है) डॉ. खरे मंत्रीमंडल के सहयोगियों की अपेक्षा बाहरी व्यक्तियो से घिरे रहते थे। मंत्रीमंडल के सदस्यों का आपसी मनमुटाव इतना अधिक बढा़ कि अन्त में कांग्रेस पार्लियामेंटरी बोर्ड को हस्तक्षेप करने के लिये विवश होना पड़ा। 24 मई 1938  के दिन यह आपसी मनमुटाव दूर करने के लिये कांग्रेस धारा सभा दल के सदस्य पचमढी मे आमंत्रित किये गये। इस समस्या को सुलझाने के लिये कांग्रेस पार्लमेण्टरी बोर्ड के प्रधान सरदार पटेल एवं दूसरे प्रमुख नेता मौलाना आजाद तथा जमनालाल बजाज भी पचमढी पहुंच गये थे। कांग्रेस हाई कमान के नेताओं ने दोनों पक्षों की बात सुनकर एक समझौता दोनो पक्षों मे करवा दिया। ग्रंथ में उल्लिखित 'दोनों पक्षों' का उल्‍लेख एवं सरदार पटेल के चुनिंदा भाषणों की किताब 'लीडर बाई मेरिट' के तथ्‍यों को पढ़ते हुए यह बात स्‍पष्‍ट हो जाता है कि विवाद या कलह सत्‍ता के लिए था।   
बाद में डॉ. खरे ने इस समझौते का पालन नही किया उल्टे बाबू राजेन्द्रप्रसाद के परामर्श को न मानते हुए उन्‍होंनें महाकोशल के तीन मंत्रियों - पं. शुक्ल, पं. मिश्र तथा श्री मेहता से त्यागपत्र मांगा, स्‍पष्‍ट तौर पर विवाद इन्‍हीं तीनों से था। इन तीनों नें कहा कि हम  केन्द्रीय पार्लमेण्टरी बोर्ड की स्वीकृति के बिना त्याग-पत्र नहीं देगें। इस पर डॉ. खरे बहुत नाराज हुए और उसनें अपने दो साथियों के साथ 20 जुलाई 1938 को गवर्नर के पास जाकर प्याग-पत्र दे दिया। गवर्नर ने प्रीमियर का त्यागपत्र तो स्वीकार कर लिया किन्‍तु महाकोशल के उन तीनों मंत्रियों को डिसमिस कर दिया। गर्वनर नें कांग्रेस दल के नेता के रूप में डॉ. खरे को नए सिरे से पूरे मंत्रीमंडल गठन करने के लिए दूसरे दिन सदन में आमंत्रित कर दिया। डॉ. खरें ने दल के नता की हैसियत से महाकोशल के इन मंत्रियों के जगह पर तीन नये मंत्री नियुक्‍त कर दिया।
गवर्नर के सहयोग से पार्लमेण्टरी बोर्डे की उपेक्षा कर डॉ. खरे ने जो कार्य किया था उस पर केन्द्रीय कांग्रेस पार्लमेण्टरी बोर्ड ने डॉ. खरे पर अनुशासन-भंग का अभियोग लगा कर उन्हें पद-त्याग करने का आदेश दिया। इतना ही नहीं इस गंभीर स्थिति पर विचार करने के लिये 21 से 23 जुलाई तक वर्धा में बाबू सुभाषचन्द्र बोस की अध्यक्षता मे कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक बुलाई गई। मौलाना आजाद, सरदार पटेल और बाबू राजेन्द्रप्रसाद ने घटना का विवरण प्राप्‍त कर कांग्रेस के दृष्टिकोण से डॉ.खरे को इसके लिए दोषी माना। ग्रंथ कहता है कि इस पर डॉ. खरे ने अपनी भूल स्वीकार की और पदग्रहण के तीन दिन के बाद उन्होने इस्तीफा देना स्वीकार कर लिया। डॉ. खरे ने टेलिफोन द्वारा गवर्नर को नए मंत्रीमंडल का त्यागपत्र दिया, इसे गवर्नर ने स्वीकार कर लिया। 
डॉ.खरे के माफी मांग लेने, स्‍तीफा दे देनें के बाद भी कांग्रेस कार्यकारिणी ने डॉ. खरें को कांग्रेस से हटा दिया और निर्णय पारित कर दिया कि नागपुर के गवर्नर ने कांग्रेस में फूट डालने के लिए डॉ. खरे व उनके साथियों से षड़यंत्र करके कांग्रेस की प्रतिष्ठा को क्षति पहुचाने का प्रयत्‍न किया है जिसके लिए डॉ.खरे जिम्‍मेदार हैं और वे काग्रेस संस्था में रहने के पात्र नही हैं। 
26 जुलाई को वर्धा में बाबू सुभाषचद्र बोस की अध्यक्षता में सीपी एण्‍ड बरार के घारा सभा के कांग्रेस दल की बैठक हुई जिसमें दल ने पं. रविशंकर शुक्‍ल को अपना नेता चुन लिया (इसके संबंध में मैं अपने पिछले फेसबुक पोस्‍ट में लिखा था -सन 1937 में 20 या 21 जुलाई को सी पी और बरार के प्रीमियर डॉ. खरे ने विधान सभा मे त्यागपत्र दिया था और इसके बाद असेम्बली पार्टी के नेता का चुनाव हुआ जिसमें जाजुजी, घनश्याम सिंह गुप्ता, पं रविशंकर शुक्ल, मेहता, खांडेकर और रामाराव देशमुख प्रस्तावित नाम थे। इनमे से जाजुजी से स्वीकृति प्राप्त नहीं की जा सकी थी और तीन लोगों ने अपना नाम वापस ले लिया। रामाराव देशमुख और पं रविशंकर शुक्ल के बीच हुए चुनाव में शुक्ल को 47 और देशमुख को 12 मत मिले, इस प्रकार शुक्ल जी नेता चुन लिए गए।
सरदार पटेल के चुनिंदा भाषणों की किताब और नागपुर स्टेट रिकार्ड में इस बात का उल्लेख है आगे डॉ खरे के द्वारा लेजिस्लेटिव असेम्बली में हंगामा किए जाने और कांग्रेस के बड़े नेताओं से शिकायत किये जाने का उल्लेख है जो पुरानी होने के कारण पढ़ते नहीं बन रहा है। आप लोगों में से कोई डॉ खरे और इस विवाद के संबंध में कोई जानकारी रखता हो तो कृपया बतावें।)। उक्‍त कांड के बाद डॉ. खरे नें 'माई टिफेन्स - मेरी सफाई' नाम से अपना एक स्पष्टीकरण और पार्टी नेताओं के विरूद्ध आरोप लगाते हुए प्रकाशित किया था। तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष व सुभाष बाबू ने डॉ. खरे की सफाई एवं आरोपों को को निराधार सिद्ध किया था।
-संजीव तिवारी
(शुक्‍ल अभिनंदन ग्रंथ, द इंडियन इयर बुक व लीडर बाई मेरिट के आधार पर)

30 January, 2018

छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद

छत्तीसगढ़ी मुहावरे, कहावतें एवं लोकोक्तियों पर कुछ महत्वपूर्ण किताबें प्रकाशित हैं। इन किताबों में मुहावरे,कहावतें और लोकोक्तियां संग्रहित हैं। मुहावरे, कहावतें और लोकोक्तियां समानार्थी से प्रतीत होते हैं, बहुधा इसे एक मान लिया जाता है। विद्वान इनके बीच अंतर को स्‍वीकार करते हैं, इसमें जो महीन अंतर है, उसे इस पर चर्चा करने के पूर्व ही समझना आवश्यक है। इस उद्देश्‍य से हम यहां पूर्व प्रकाशित किताबों में इस संबंध में उल्लिखित बातों को अपनी भाषा में विश्‍लेषित करने का प्रयत्‍न करते हैं ताकि इसके बीच के साम्‍य एवं विभेद को समझा जा सके।  
छत्तीसगढ़ी मुहावरों पर अट्ठारहवीं सदी के अंतिम दशक में लिखी गई हीरालाल काव्‍योपाध्‍याय की ‘छत्‍तीसगढ़ी बोली का व्‍याकरण’ में जो लोकोक्तियां संग्रहित हैं उन्‍हें कहावतें कहा गया है। सन् 1969 में प्रकाशित डॉ.दयाशंकर शुक्‍ल शोध ग्रंथ ‘छत्‍तीसगढ़ी लोक साहित्‍य का अध्‍ययन’ में शुक्‍ल जी नें कहावतों को लोकोक्ति का एक अंग कहा है एवं लगभग 357 कहावतों का संग्रह प्रकाशित किया है। सन् 1976 में डॉ. चंद्रबली मिश्रा के द्वारा प्रस्‍तुत शोध ग्रंथ ‘छत्‍तीसगढ़ी मुहावरों और कहावतों का सांस्‍कृतिक अनुशीलन’ में कुछ शंका का धुंध छटा है। हालांकि यहां भी स्‍पष्‍ट रूप से इन्‍हें विभाजित नहीं किया गया है किन्‍तु फिर भी पूरे शोध ग्रंथ के अध्‍ययन से बात कुछ समझ में आती है। डॉ.अनसूया अग्रवाल के शोध ग्रंथ सन् 1990, ‘छत्‍तीसगढ़ी लोकोक्तियों का समाजशास्‍त्रीय अध्‍ययन’ में इसके बीच के अंतर को स्‍पष्‍ट तरीके से अलग नहीं किया गया है बल्कि दोनों को लोकोक्ति के रूप में ही प्रस्‍तुत किया गया है। सन् 2008 में प्रकाशित चंद्रकुमार चंद्राकर की किताब ‘छत्‍तीसगढ़ी मुहावरा कोश’ में इन्‍हें संयुक्‍त रूप से मुहावरा ही कहा गया है।

सबसे महत्वपूर्ण शोध ग्रंथ 'छत्तीसगढ़ी लोकोक्तियों का भाषावैज्ञानिक अध्ययन' सन् 1979 में पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित हुआ था। इस ग्रंथ में 940 लोकोक्तियों का संग्रह और शोध, स्मृतिशेष डॉ. मन्नूलाल यदु ने प्रस्तुत किया है। यदु जी ने लोकोक्ति को समझाते हुए लिखा है कि लोक की उक्तियां इस प्रकार होती हैं कि एक गवंई पंच,  बैरिस्टर को तर्क से हतप्रभ कर दे। वे आगे लिखते हैं कि लोकोक्तियां प्राय: संक्षिप्त, सारगर्भित और सप्रमाण होती हैं। लोकोक्ति का शब्द विच्छेद लोक की उक्ति है। इसे अर्थ की पूर्णता के लिए अतिरिक्त शब्दों की आवश्यकता नहीं पड़ती अर्थात लोकोक्तियां स्वयं में पूर्ण होती हैं। वे इसे बेहतर तरीके से समझाते हुए एक जगह लिखते हैं कि 'लोकोक्ति का एक-एक शब्द नपा-तुला होता है। वह बहुमूल्य रत्नों द्वारा पिरोया ऐसा अद्भुत हार है जिसका एक रत्न टूटा या बदला, कि हार की चमक धूमिल पड़ी।' उन्होंने ग्रंथ के परिभाषा खंड में इस पर विस्तृत विश्लेषण करते हुए लोकोक्ति को कहावत कहा है और उसे मौखिक लोक साहित्य माना है। उन्होंने विभिन्न विद्वानों की परिभाषाओं के आधार पर इसके छः तत्व निरूपित किए हैं। 1. बंधा हुआ लोक प्रचलित कथन 2. अनुभव की बात संक्षेप में 3. अलंकृत भाषा 4.सूत्रात्मक शैली 5. जीवन की आलोचना 6. लोक की उक्ति।
डॉ. मन्नूलाल यदु जी नें ही अपने शोध ग्रंथ में आगे लोकोक्ति और मुहावरे के बीच अंतर को भाई-बहन का अंतर बताते हुए उदाहरण सहित स्पष्ट किया है। पाठकों को इसे समझना आवश्यक है इसलिए हम इसे संक्षिप्त रूप में समझाने का प्रयास करते हैं-
1. व्याकरण कलेवर में वाक्य गठन की दृष्टि से लोकोक्ति पूर्ण वाक्य हैं वही मुहावरे खंड वाक्य। उदाहरण देखिए लोकोक्ति देखिए 'थैली के चोट ल बनिया जाने' (धन की थैली का चोट  धनिक ही जानेगा), 'लोभी चमरा ल बाघ धरय'(चमड़े की लालच में बाघ द्वारा मारे गए ढोर का चमड़ा उतारने वाले को बाघ खाता है), 'सावन म आँखी फुटिस, हरियर के हरियर'। मुहावरा 'करलई मातब' (बड़ा दुःख) -सियान के मरे ले घर म करलई मात गए। 'छाती के पीपर' (घर का जबर शत्रु जो छाती को विदीर्ण कर दे) - का बतावव रे छाती के पीपर जाम गए।
2. अर्थ की दृष्टि से लोकोक्तियां पूर्ण हैं वही मुहावरे किसी शब्द के साथ पूर्ण होते हैं। (अर्थ की दृष्टि से लोकोक्तियां स्वालंबी होती हैं जबकि मुहावरे परमुखापेक्षी होती हैं।) उदाहरण लोकोक्ति 'हाथ के अलाली म मुंह म मेंछा जाय' (मूछ को दिशा नहीं दोगे तो बाल मुँह के अंदर जाएंगे ही,अति आलस्य), 'पांडे के पोथी-पतरा, पंड़इन के मुअखरा' (पंडिताइन का ज्ञान पंडित से ज्यादा), 'कउँवा के रटे ले ढोर नइ मरय' (लालची के रटते रहने से अपेक्षित वस्तु नहीं मिलता), 'औंघात रहिस जठना पागे' (जिन खोजा तिन पाइयां)। कहावत 'धुंगिया देखब' (मौत देखना) - रोगहा तोर धुंगिया देखे ले मोर जीव जुड़ाही।
3. शब्द संख्या की दृष्टि से लोकोक्तियां ज्यादा शब्दों की होती हैं जबकि मुहावरों में शब्द कम होते हैं।
4. शब्द परिवर्तन की दृष्टि से लोकोक्तियों में शब्द परिवर्तित नहीं होते बल्कि वह जैसा है वैसा ही प्रयोग होता है। जबकि मुहावरे अन्य शब्दों के साथ प्रयुक्त होते हैं। उदाहरण लोकोक्ति 'चलनी म गाय दुहय, करम ल दोस देवय' (भाग्यवादी लोगों के विरुद्ध), 'हपटे बन के पथरा, फोरे घर के सील', 'दुब्बर ल दु असाढ़'। 'कान काटना', 'बीड़ा उठाना', 'बाना उचाना'।
5. लोकोक्ति का प्रयोग सामान्यतया खंडन-मंडन या उपदेश के लिए होता है। जबकि मुहावरे का प्रयोग अर्थ में चमत्कार और वैशिष्ट लाने के लिए होता है। मुहावरे के प्रयोग से सामान्य कथन में प्रभाव आता है और वह सशक्त एवं प्रभावशाली हो जाता है। यथा 'तेजी से भागा',  'सिर पर पैर रख कर भागा'। उदाहरण लोकोक्ति'डोंगा के अगाड़ी अउ गाड़ी के पिछाड़ी', 'कुकूर भूँके हजार, हाथी चले बाजार', 'दूसर ल सिखोना दय, अपन बइठ रवनिया लय', 'कुकूर के पूछी जब रही त टेडगा के टेडगा', 'कन्हार जोते, कुल बिहाये'
6. लोकोक्ति एक प्रकार का अलंकार है। जबकि मुहावरा लक्षणा और व्यंजना युक्त शब्द समुच्चय है। मुहावरा सभी अलंकारों में हो सकता है।
7. लोकोक्तियाँ पद्यात्मक, लयात्मक, छंद युक्त युक्त होते हैं। जबकि मुहावरे गद्यात्मक होते हैं।
अब हमारे विमर्श का विषय 'हाना' किसे कहते हैं, यह प्रश्न सामने आता है। इसके लिए हम एक दूसरे महत्वपूर्ण ग्रंथ 'छत्तीसगढ़ी व्याकरण' पर अपना ध्यान केंद्रित करते है, जिसे मंगत रविंद्र जी ने लिखा है। इसमें 482कहावतों का संकलन है। मंगत रविंद्र जी ने हाना और भांजरा दोनों के बीच अंतर को स्पष्ट करने का प्रयास किया है। उन्होंने मुहावरे के लिए 'हाना' शब्द का इस्तेमाल किया है। जबकि कहावतों के लिए 'भांजरा'और 'जोगवा' शब्द का इस्तेमाल किया है। उन्होंने'भांजरा' को बांटना और 'जोगवा' को योग करना या मिलाना बताया है। यानी जो छत्तीसगढ़ की कहावतें हैं वे'भांजरा'  और 'जोगवा' हैं। आगे वे 'हाना' और 'भांजरा'दोनों को लोकोक्ति कहते हैं क्योंकि दोनों लोक की उक्ति है। उन्होंने अपने अनुसार छत्तीसगढ़ी में इसे विश्लेषित करते हुए लिखा हैं कि, हाना-भांजरा अर्थात लोकोक्ति,लोकवाणी से लोक जीवन में रचा बसा है। लोक और लोकोक्तियां संपृत हैं। इन्होंने भांजरा यानी कहावतों को गीता जैसा और हाना यानी मुहावरों को अंधेरी रात में पूर्णिमा का चांद निरूपित करते हुए लिखा है कि, 'भांजरा' में छंद की झलक भी होती है,  'हाना' में भविष्य के लिए आगाह की झलक।
हमारा यह विमर्श 'हाना' यानी मुहावरे पर केंद्रित है। ऐसे लोक प्रचलित शब्द युग्म पर जो अपने अंदर विलक्षण अर्थ छुपाए हो, जो लक्षणा और व्यंजना शक्ति से सुनने वाले पर प्रभाव जमाये। उपर दिए गए अंतर के अनुसार ‘भांजरा’ यानी कहावतों पर चर्चा कर ली जाए तो इन दोनों के बीच के अंतर को भली भांति समझा जा सकेगा। डॉ. चंद्रबली मिश्रा नें अपने शोध ग्रंथ में कुछ छत्‍तीसगढ़ी मुहावरों और कहावतों का उल्‍लेख किया है जो समानार्थी हैं। वे इस प्रकार हैं –
छत्‍तीसगढ़ी में एक मुहावरा है ‘मन मसकई’ अर्थात मन ही मन अकारण क्रोध करना। इससे मिलता जुलता एक कहावत है ‘हपटे बन के पथरा, फोरे घर के सील’ अर्थात अन्‍य कारण से अन्‍य पर क्रोध उतारना। ज्‍यादा बोलने या अपना ही झाड़ते रहने पर छत्‍तीसगढ़ी मुहावरा है ‘पवारा ढि़लई’, इसी पर विस्‍तारवादी कहावत है ‘बईठन दे त पीसन दे’ जो हिन्‍दी के अंगुली पकड़ कर गर्दन पकड़ना का समानार्थी है। लालच को प्रदर्शित करने के लिए मुहावरा है ‘लार टपकई’ और ‘जीभ लपलपई’, इसी से मिलता जुलता एक कहावत है ‘बांध लीस झोरी, त का बाम्‍हन का कोरी’ हालांकि यह यात्रा में बाहर निकलने पर भोजन करने के संबंध में है किन्‍तु यह लालच के लिए भी प्रयुक्‍त होता है। निर्लज्‍जता को प्रदर्शित करने के लिए मुहावरा है ‘मुड़ उघरई’, इससे संबंधित कहावत है ‘रंडी के कुला म रूख जागे, कहै भला छंइहा होही’ वेश्‍या कब किसका भला करती है, किसे छांव देती है। आदत से संबंधित मुहावरा है ‘आदत ले लाचार होवई’, इसी से संबंधित कहावत है ‘जात सुभाव छूटे नहीं, टांग उठा के मूते’ और ‘रानी के बानी अउ चेरिया के सुभाव नई छूटे’एवं ‘बेंदरा जब गिरही डारा चघ के’।
अव्‍यक्‍त मजबूरी के लिए मुहावरा है ‘मन के बात मने म रहई’, इसी से संबंधित कहावत है ‘चोर के डउकी रो न सकय’। बेइमानी पर मुहावरा है ‘नमक हरामी करई’ और‘दोगलई करई’, इस पर कहावत है ‘जेन पतरी म खाए उही म छेदा करय’। संदिग्‍ध आचरण से संबंधित मुहावरा है ‘पेट म दांत होवई’, इससे संबंधित कहावत है ‘उप्‍पर म राम राम भितरी म कसई’। यह मुह में राम बगल में छूरी का समानार्थी है। जो मिल ना पाये उसकी आलोचना करने संबंधी हिन्‍दी के समान ही छत्‍तीसगढ़ी में भी मुहावरा है ‘अंगूर खट्टा होवई’, इससे संबंधित कहावत है‘जरय वो सोन जेमा कान टूटय’ अर्थात मुझे वह सोन की बाली नहीं चाहिए उससे कान टूठ जाता है।
अत्‍याचार करने के संबंध में मुहावरा है ‘आगी मुतई’,इससे संबंधित कहावतों में ‘डहर म हागे अउ आंखी गुरेड़े’, ‘आगी खाही ते अंगहरा हागही’, ‘पानी म हगही त ऊलबे करही’। अनुवांशिकता से संबंधित मुहावरा है ‘बांस के जरी, बांसेच होही’ और ‘तिली ले तेल निकलई’, इससे संबंधित कहावतें हैं ‘गाय गुन बछरू, पिता गुन घोड़ा,बहुत नहीं तो थोड़ा थोड़ा’, ‘जेन बांस के बांस बंसुरी उही बांस के चरिहा टुकनी’, ‘जइसे दाई वइसे चिरा, जइसे ककरी वइसे खीरा’।
आशा है उपरोक्‍त विवेचन से हाना एवं भांजरा के बीच का भेद स्‍पष्‍ट हुआ होगा।
संजीव तिवारी

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